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चल अकेला, चल अकेला

सूरज की लालिमा से रात की कालिमा तक, पूरब से पच्छिम तक, उत्तर से दक्खिन तक, चलता चला जाता हूँ, बस चलता चला जाता हूँ। भूल गया राह मेरी, पथ नया बनाता हूँ, बस चलता चला जाता हूँ। क्या किया? क्यूँ किया? कब किया? कैसे किया? सोच नहीं पाता हूँ। क्या गलत? क्या सही? क्या गगन? क्या मही? बस प्रश्न नया पाता हूँ। चलता चला जाता हूँ। छोड़कर वह पथ पुराना, भूलकर सारा ज़माना, ज्ञान गीता का लिये जब एक पथ मैंने चुना था। सोचता था राह होगी ये सुखद, शीतल, सरल; पर बन चुका यह अग्निपथ, यह देखकर माथा धुना था। मानता हूँ, राह सारी एक सी होती नहीं, पर चलें जिसपे महाजन, पथ वही सबसे सही। था नहीं समझा कि जब गुरुदेव का एकला सुना था। रास्ता होगा, सही होगा, वही होगा, साथ चलने को मगर तैयार, कोई भी नहीं होगा। चल अकेला राह पर, तज मोह, माया, कामना; होगी मंजिल तेरे सर, पहले तू अपना मन बना। हारने के बाद बाजी जीतते हैं सब यहाँ, चल अकेला, चल अकेला; पथ तू अपना खुद बना। होगी मंजिल तेरे सर, पहले तू अपना मन बना।। 

गर बदलना है, तो बदलेंगे, मगर खुद को

दस दिशायें घूमकर, पर्वतशिखर को चूमकर, नद-ताल सब को पारकर, अधर्म का संहार कर, क्या पा गये प्रभु आप तुम? माना कि स्वामी हो जगत के, करते हो तुम चिन्तन चिरंतन, पर कहाँ बदला है कुछ? संसार के इस पार से आकाश के उस पार तक, पसरा हुआ अंधकार है। सत्य, शुचि; सब मूल के प्रतिकूल, हर तरफ़ पापाचार है। अज्ञान है, अभिमान है, अपमान है; पर नहीं संज्ञान है।। दुनिया छली है, छल रही है, अन्याय, शोषण के सहारे चल रही है। अच्छाइयों का मान-मर्दन हो रहा है, लगता है यूँ, भगवान जैसे सो रहा है।। पर सोचता हूँ, कर रहे क्या खाक हम, भगवान है तू, तो तुम्हारे बाप हम। छलते हैं तुझको, या खुदी को छल रहे हैं, जिस आग को माचिस दी, उसमें जल रहे हैं।। अब वक्त है, संज्ञान हो हमको हमारी जात का, जो कर रहे हैं, हर एक उस आघात का। गर बदलना है, तो बदलेंगे, मगर खुद को; ना होगी दुनिया की दुत्कार दुनिया में, रहेंगे जब तलक हम यार दुनिया में। रहेंगे जब तलक हम यार दुनिया में।। 

रात गई, बात गई

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रात गई, बात गई, सपनों से इक मुलाकात गई, तारों की इक बारात गई, और चाँदनी उनके साथ गई। जो चली गई, वो चली गई, आई है अब ये सुबह नई, ये सुबह नई आनन्दमयी, उठ जाग मुसाफ़िर, भोर भई।।

मात्र भाषा नहीं, मातृभाषा है हिन्दी

आंग्लभाषा भी है, फ्रेंचभाषा भी है, रूसीभाषा भी है, चीनीभाषा भी है, भाषा सब हैं, मगर मात्र हैं; मात्र भाषा नहीं, मातृभाषा है हिन्दी।। प्रेम माता सा कोई भी दूजा नहीं, मातृसेवा से बढ़कर है पूजा नहीं, मातृभाषा की उन्नति का निश्चय करो; ज्ञान के साथ संस्कृति का संचय करो।।
वो नज़र दो-चार थी, या इश्क की रफ़्तार थी, चौदहवीं का चाँद थी, पहली नज़र का प्यार थी; जो भी थी वो दिलनशीं, अपनी समझ के पार थी। हम मिले पहली दफ़ा, जब शाम थोदी सर्द थी, देखकर उसको वहीं ठिठके हुए से रह गये; चाहते कहना बहुत थे, मन ही मन में कह गये। वो मगर मशगूल थी अपनी ही सी कुछ बात में, हम खड़े थे दूर और वो थी सखी के साथ में। फ़िर  ये दिखना रोज़ की आदत में शामिल हो गया; उसकी इक मुस्कान का शागिर्द ये दिल हो गया। चाहते तो थे पर मिल ना सके, ना हिम्मत हुई कि कुछ कह सकें। फ़िर  एक दिन किस्मत रंग लाई, उसने हमें देखा और वो मुस्कुराई। किसी बहाने से ही सही जान-पहचान हो गई, और फ़िर  वो भीड़ में ना जाने कहाँ खो गई। फ़िर  हम मिले एक अरसे बाद, और अबकी जो मिले तो मिलते ही रहे। दिल में अरमानों के नित-नये फूल खिलते ही रहे। खैर छोड़िये इसे यहीं विराम देते हैं, इस कविता को क्या नाम दें, ये तो सोचा नहीं, पर यहाँ लौट के जरूर आयेंगे। आना ही पड़ेगा,...

प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया

हमने आँखों में सौ सपने सजाये , उसे देखा और हम मुस्कराये। गलती बस इतनी की उसे अपना मान बैठे, जो बूझे नहीं अब तक वही सपना मान बैठे। करते भी तो क्या, ये दिल ही तो है, और फ़िर दिल तो बच्चा है जी। हम समझे दिल्लगी ही सही; जो भी है अच्छा है जी। माना हम अच्छे थे, सच्चे थे; लेकिन अकल से एकदम कच्चे थे। दिल्ली को हमारी ये दिल्लगी रास नहीं आई, लग गई नज़र।  लड़की ने पता नहीं दिल लगाया भी या नहीं, कमबख्त हम पर तो आिशकी का फ़ितूर था। हम थक गये उसके घर के चक्कर लगाते-लगाते; और वो बोली तुम हमको ज़रा भी रास नहीं आते। अब इश्क का भी अज़ब दस्तूर है, जब लगने पे आती है, तो लग ही जाती है। ज़ख्म बहुत गहरा हुअ, वक्त लगता सा था ठहरा हुआ; ऐसे फ़ँसे मायाज़ाल में कि न माया मिली न छाया। हमको अपने इस हाल पे जमकर रोना आया। रोये, खूब रोये और क्यूँ न रोते; अपने ही करम धो रहे थे। तय कर लिया प्यार, मोहब्बत, इश्क का मीठा-मीठा रिस्क अब नहीं सहना; इतने टार्चर से बेहतर है चैन से अकेले रहना।।

बीती ताहि बिसार दे...

आज फ़िर वही बात याद आती है, फ़िर से वो दिन-रात याद आती है। हर बात भुला सकता है मन किन्तु, हर बिसरी हुई बात फ़िर याद आती है। सब कुछ दिख रहा है साफ़-साफ़, फ़िर आँखें क्यूँ धुँधलके में रहना चहती हैं। खुश रहना कितना सरल सा है; फ़िर क्यूँ ये पलकें बरबस ही बहना चाहती हैं। मन में एक अजब सा सन्तोष है, चित्त में एक सुलगती सी ज्वाला है। जो पीयूष-सुधा बन जीवन दे सकता था; वो बन बैठा विष का प्याला है। खैर अब जो भी है, जैसा भी है, उसे उसी रूप में स्वीकार करना है। राह में फ़ूल आयें या काँटे; सबको समभाव से पार करना है।।

मृत्युपर्व

मृत्यु सत्य है जीवन का, या जीवन मरता नहीं कभी। कहने को आदर्श खोखले, निन्दा करता नहीं कभी।। मेरा जीवन मेरा है, ईश्वर! फ़िर तेरा, कया तेरा; जब नहीं मानता ईश्वर को, फ़िर क्यूँ कहता ईश्वर मेरा। एक देव एक दानव मन में सदा बसाये हम रहते, जब जिसकी मर्जी चलती अपना-अपना दोनों कहते। सत्य कटु है, किन्तु अटल है, दानव मरता नहीं कभी; हाँ, सम्भव है देव कदाचित मर जाये।  दानव हर पल हर क्षण तत्पर रहता है, ये भी सम्भव है देव कभी कुछ कर जाये। मैं नहीं कह रहा दानव शक्तिशाली है, पर क्यूँ हमने देवों से शत्रुता पाली है। अन्धा दानव कितनी भी शक्ति दिखा जाये, पर ये भी तय है कि प्रकाश भी आएगा। माना ताकत है दानव की चतुराई में, पर कब तक वो भी देव से खैर मनाएगा।  सतयुग, त्रेता,द्वापर से कलि तक हम निकले, उतना ही आगे देवों से दानव निकले। पहले देवों में भी मानव सम्मानित था; अब तो मानव, दानव से भी दानव निकले। पर वाह विधाता! तू भी कम चालाक नहीं, तेरे आगे चल सकी किसी की धाक नहीं। जैसे-जैसे हम एक-एक युग बढ़ते गये; तुम मानव की आयु कम, और कम करते गये। है मृत्यु, विजयदशमी देवों की दानव पर,...

प्रेम

शुकदेव और काग प्रभु की चर्चा अत्यन्त महान, खिल जाते है रोम सारे सिंचित होते प्राण । एक प्रात जब प्रश्न जगत हित काग प्रभु ने छेड़ा, शुक के मुख से उत्तर सुनकर उदगत हुआ सवेरा।। प्रश्न काग का उत्तम था, क्यों राधा श्याम कहाए जबकि विवाह श्याम निज मति से रुक्मणि संग कराये। प्रभु शुक ने उत्तर तब दीन्हा, सुनहु काग मुनिराज ! प्रेम अभीष्ट प्रेम अवलंबित प्रेम जीव बड़भाग। प्रेम काम का पुंज नहीं, है प्रेम प्रकृति का रूप; प्रेम प्रकृति के इस वर्णन में राधा दिव्या स्वरुप। प्रेम सदा परिणत हो विधिवत जगत मान्य परिणय में, यह आवश्यक नहीं किंतु इतना निश्चित आशय में। प्रेम सदा उद्दीप्त रहेगा प्रेम सदा उत्कृष्ट, प्रेम भाव का सानी जग में कहीं नहीं अन्यत्र।। प्रेम नहीं वो किंचित जिसमें लेश मात्र भी छल है, प्रेम समर्पण प्रेम भावना प्रेम अतीव सरल है। यों तो जीव सकल हैं जीते इस जग के आश्रय में ; लेकिन जीवन सफल वही जो बीते प्रेम प्रणय में ॥ -- आदित्य कुमार तिवारी < नवम्बर २००६ > ( ये कविता मैंने उस समय लिखी थी, जब मै अपने अभियांत्रिकी तृतीय वर्ष में था और उद्योगनगरी एक्सप्रेस से मुं...

परम्परा

जीभ का काम सिर्फ़ बोलना नहीं होता, हाथ का काम सिर्फ़ सामान उठाना नहीं होता, पैर का काम सिर्फ़ चलना नहीं होता, शरीर का काम सिर्फ़ बोझ उठाना नहीं होता। जीभ हरिश्चंद्र की, जिसने जीवन भर सिर्फ़ सत्य का साथ दिया। हाथ एकलव्य का, जिसने गुरु दक्षिणा में अंगूठा दान दे दिया। पैर महात्मा गांधी के, जिन्होंने अंग्रेजो को भारत से निकालकर ही दम लिया। शरीर दधीचि का, जिन्होंने देवहित अपनी अस्थियों को दान कर दिया। भीड़ के साथ तो सभी चलते रहते हैं; पर जो कल का साथ दे, परम्परा उसे कहते हैं। ( ये कविता मैंने कोई ६-७ वर्ष पहले लिखी थी, आज एक दैनन्दिनी में मिल गयी। )

काहे रे मन धीर ना धरे

काहे रे मन धीर ना धरे, जो बस आवे सो ही करे। मन-ही-मन ये सहज मुसकावे, मन-ही-मन किस-किस पे मरे।। मन बस होय राम, सिय भायी, कान्हा ने रुक्मिणी भगायी। मेरो मन भी यही विचरै, जदपि बिबस कि करे तो क्या करे।। बालकाल सखियाँ अति भायीं, तरुणाई सब जग सुखदायी। पर म्हारी छबि पे कोऊ ना मरै, अब हमहूँ कितने जतन करैं।। मोरी प्रेम ब्यथा सुनौ, राधा नागरि सोइ। हमरे किये तो कछू ना हुइहै, अब तुम्हरे किये ही होइ।।

जीवन-संग्राम

रात अब जाने को है, फ़िर सुबह आने को है। ढल गया था कल जो सूरज, आग बरसाने को है।। जो अभी था डूबता सा, आ गया अब नाव पर। तप्त रेती की लपट से, घने वन की छाँव पर।। कब कहीं रोके रुकी है, अग्नि, जल की धार से। बच सका कब कोई जीवन, सर्प-विष-फ़ुँकार से।। जूझकर लड़ना समय से, ज़िन्दगी का काम है। मौत को भी दे चुनौती, ज़िन्दगी संग्राम है।।

मेरी प्रियतमा

आज एक ख्वाब देखा है मैंने, ख्वाब अपनी आँखों में सपने बोने का, और फ़िर लम्हा-दर-लम्हा उन सपनों को सींचते हुए, एक नयी सुबह का इन्तजार करना। बड़ा अजीब है यह सब, कुछ रोज़ पहले उससे मैं पहली बार मिला था, यहीं किसी छाँव के नीचे, फ़िर कुछ मुलाकातों में ना जाने क्या हो गया। आज कुछ नही सुहाता बगैर उसके, हर पल जाने क्यूँ उसकी ही याद सताती है, कुछ दिन पहले तक जिसे मैं जानता भी नहीं था, आज वही मेरी हर पल की साथी है। पर यह तो केवल अर्ध-सत्य है, पूर्ण-सत्य तो तब होता जब वो भी कुछ कहती, नहीं जानता हूँ क्या है उसके मन में, कुछ है भी या कुछ भी नही। पर शायद हिम्मत भी नही है यह पूछ पाने की, किस हक से मैं उससे ये पूछूँ। कोई तो अधिकार नही मेरा उस पर, पर मेरा तो खुद पर भी अधिकार नही रहा अब। मेरी आँखों में बस उसका सपना है, मेरे होठों पर उसकी हँसी। मेरा हर पल अब बस उसका ही है, वही है मेरी प्रियतमा उर्वशी।।

चुलबुली लड़की

जब हँसती है, अपनी हँसी से सारा जग हरसाती है। इक चुलबुली लड़की। जब वो रोती है, मुझको भी संग में रुलाती है। इक चुलबुली लड़की। जब मुझसे बातें करती है, लगता है बस इसकी बातों में बस जाऊँ। जब वो उलझे बाल सँवारे, मैं कंघी बनकर के बालों में फ़ँस जाऊँ। लेकिन मैं मजबूर बहुत हूँ, सच्चाई से दूर बहुत हूँ। जिस चुलबुली लड़की ने मेरा दिल भरमाया है, वो मेरी कल्पना है, निरी माया है। पर अपनी इस कल्पना के साथ मैंने जी है जिन्दगी, औरों के लिये रहस्य, लेकिन मेरी यही है जिन्दगी।

थक गया हूँ बहुत...आज सोता हूँ मैं

आज मुझे सो लेने दो, दिन भर का थका हुआ हूँ; नींद में ही सही रो लेने दो।। जब उसका कोई सहारा ना था, वो किसी का भी इतना दुलारा ना था; तब सहारा दिया था उसे एक दिन।। उसके आँसू गिरे जब भी, रोया हूँ मैं, उसकी हर आह पर एक आवाज की; उसको जीने की हर पल नसीहत भी दी।। आज खुश है वही और रोता हूँ मैं, उसको चिन्ता नहीं एक पल के लिये; अपने आँसू से पत्थर भिगोता हूँ मैं।। गम की दुनिया में गम के ही साये मिले, दोसत जितने भी ढूँढे पराये मिले, एक मुद्दत से हूँ राह पर मैं खड़ा; लोग जितने भी देखे,सताये मिले।। गम नहीं रीत है ये ही संसार की, क्षुद्रता है यही स्वार्थ व्यापार की, किन्तु फिर भी तिमिर को सँजोता हूँ मैं; थक गया हूँ बहुत,आज सोता हूँ मैं।।

हम हम हैं...

हम हम हैं, इस बात में दम हैं, क्लास हम नहीं जाते तो फिर करते क्या हैं? लाइब्रेरी को आज भी हमारा इन्तजार है। प्रोफ़ेसर हमारी एक झलक देखने को बेकरार है।। और हम, हम इतने बड़े मक्कार हैं, 24 घन्टे हमें इस सड़ेले से ओरकुट का बुखार है।। पहले हमें होम सिकनेस ने सताया था, अब घर से दूरियों ने बहकाया है, हमने ज़माने में सबसे प्यार किया, पर जिससे भी इजहार किया, उसने हमें रुलाया है।। अन्दर से हम स्वीट ऐन्ड सोफ़्ट हैं, बट बाहर से थोड़े टेक्निकल फ़ाल्ट लगते हैं, अजी छोड़िये भी यह सब तो केवल बातें हैं, हम लड़कियों को मिस इण्डिया कहते नहीं थकते, उन्हें हम सेल का माल नज़र आते हैं।। सारी जिन्दगी हमें हमारी गलतफ़हमियों ने बहकाया, हमने ह्यूमर लाया तो लोगों ने हमको मामू बनाया है, हम भारत की मिट्टी की अनुपम खोज हैं, लोग कहते नहीं थकते हम धरती का बोझ हैं।। बट अब जो हैं सो हैं, हमारी सोच सबसे अलग है तो क्या हुआ, वो तो हम मानवता के मनु नहीं बने, वरना मनु अकेला जिन्दा बचा था,और कुछ जानवर भी बचाये थे, हम तो खुद से क्या उम्मीद रखें,उन जानवरों को भी डुबाते। अब तो गली के कुत्ते हम पर भौंकने से भी इनकार करते है, हमारे हाथों से...

वो सुबह कब आयेगी...

सुबह जब ओस गहराती है, फिर वही बात याद आती है, वो चाँद का ढलना, वो सूरज का आना, वो कनखियों से फूलों का मुस्कुराना, पर क्यों नहीं लगता ये सब उतना सुहाना, जितना तब था, क्यों फूल चुभते हैं हृदय के पोरों पर, क्यों सूरज हरे कर देता है घाव सीने के, क्यों सुई सी चुभती है ये सुबह, क्या था तुम्हारी उस मुस्कान मे, कि जब तुम मुस्कुराती थी, ये सारा आसमान अपना सा लगता था, जब तुम पलकें झपकाती थी, लगता था जैसे सारा जहान मेरे साथ है, पर फिर एक दिन अचानक तुम मुझे छोड़कर चली गयी, तुम नही आयी, पर तुम्हारी खबर आयी, ऐसी भी क्या मजबूरियाँ थी, कि मुझसे बेवफ़ाई की तुमने, अब तुम तो जैसे तैसे जी ही रही होगी, पर मैं जानता हूँ अपनी ज़िन्दगी को, बिना साँस के जीना क्या होता है, बिना एहसास के जीना क्या होता है, पर फिर भी जी रहा हूँ मैं, बस एक आस के साथ, उस सुबह के इंतज़ार में।

खबरदार

लाला और शमशेर बहादुर दोनों बचपन के यार, दोनों ने मिल बैठ बनाई मिली जुली सरकार, कुछ विकास की माला जापे, कुछ को आत्मविकास, सब के सब ढोंगी पाखन्डी, रोज़ रचावत रास। बात-बात में बात बढ़ गयी बढ़ गया अन्तर्द्वन्द्व, बने विपक्षी ये दोनों हुए सत्ता पक्ष के खण्ड, दोनों ने मिल-बाँट के काटे हिन्दू-मुस्लिम तार, दंगे की शुरुआत हुई और मच गयी हाहाकार।। हर तरफ़ खून की नदियाँ बह रही थी, लाशें तैर रही थीं लाल-लाल पानी में, खून ही खून था खून का सैलाब था, बनी हज़ारों विधवायें हाय इस जवानी में; जनतंत्र में, गणतंत्र में, नेताओं के षडयंत्र में, बहता रहा खून इस भारत लोकतंत्र में।। यदि अब भी हम ना घेर सके इन नेताओं को, उनकी हर गलती को दुर्भाग्य मानते रहे, हर नेता अपनी कोठी बनाये करोड़ों से, गरीब जाड़े में ठिठुर-ठिठुर काँपते रहे। तो वो दिन दूर नहीं जब हम भी सड़क पर नज़र आयेंगे, अभी तो एक हाथ पानी में डूबे हैं,कपडों में लिपटे हैं, जब प्यास लगेगी प्यासे रह जायेंगे, जब भूख लगेगी दोनों हाथ फ़ैलायेंगे।।

मातृभूमि

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हे माँ!तुझसे बढकर ना कोई अपना, अब जागा हूँ नींद से देख रहा था सपना। करुणा ममता अपनेपन में तू अनुपम है, दया प्रेम सौहार्द्र का तू संगम है।। जब मैं रोया तूने मुझको गले लगाया, जब भी मुस्काया तूने है साथ निभाया। चला गिरा दौड़ा लातें भी मारी तुझपर; पर न्योछावर करती रही तू प्रेम निरन्तर।। अगर कोई संसार में बढ़कर तुझसे, माँ, है, भले विधाता कहे ये मुझसे झूठ कहा है। अपना पेट काटकर मुझको रोटी देती, बदले में मुझसे ना है कुछ भी लेती। जीवन भर तू हर पल मुझको अपनाती है, बाद मृत्यु के काम मातृभूमि आती है।। तेरी मिटटी का सोंधापन मुझको भाता , तेरा निर्मल जल है सबकी प्यास बुझाता। उसी मातु पर कोई विदेशी आँख गड़ाये, तेरी रक्षा ना पुत्र तेरा कर पाये। माँ डरना मत तू इतने पुत्रों की माँ है, बाल तेरा छू जाये किसी में शक्ति कहाँ है।। जिस-जिस ने आघात तुझे माँ पहुँचाये हैं, वो तेरा मातृत्व नहीं जान पाये हैं। पुत्र सुपुत्र कुपुत्र भले जैसा जो भी हो, पर भारत माँ ममता का आगार तुम्ही हो। अगर दोबारा इस धरती पर जीवन पाऊँ, भारत माँ हर बार तेरा बेटा कहलाऊँ।।

तदात्मानं श्रजाम्यहम्

दो गृहस्थाश्रमश्रमी तरुवृंद मध्य अवगुंठित हुए, मुष्टिकाप्रहार के परिणाम से किञ्चित मर्म प्रस्फुटित हुए अरुण नेत्र, वारिज नयन, दोनों का रक्तरंजित तन; मन क्रुद्ध श्वास अवरुद्ध हाहाकार से पूरित हुआ वन॥ यह सम्पूर्ण कर्ताकर्ममय प्रकरण न, अपितु प्रयोज्य था, इस युद्ध में विजयीसदॄश बालि मरण के योग्य था वानरदल अधीप सुग्रीव इस युद्ध में असमर्थ था, यदि पराजय निश्चित ही थी, तब युद्ध का क्या अर्थ था॥ पर अर्थ था इस युद्ध का कि अनर्थ रोका जा सके, सुग्रीव की अर्धांगिनी सुग्रीव वापस पा सके। इस अर्थ पूरण हेतु प्रभु श्रीराम ने किया बाण संधान, वध हुआ अब बालि का दिग्गज थे प्रत्यक्ष प्रमाण॥ दिग्-दिगन्त हर्षित हुए, पुष्पवृन्द वर्षित हुए, अधर्म का वध जान सब अधर्मी प्रतिकर्षित हुए॥ हे प्रभु, मम सम दीन नहिं, नहिं तुम सम दीनानाथ मेरी भव-बाधा हरौ कृपासिन्धु रघुनाथ॥