Friday, August 30, 2013

ब्रह्मचारी की अन्तर्व्यथा

इक लौ देखा जब तुझे भरकर दिल में प्यार,
इक लौ जल उठी प्रेम की, हरसा दिल इक बार।
इक लौ मेरे प्रेम से तोड़ी तूने तार,
इक लौ ही काफ़ी तुझे करने को रतनार।

प्रेम मेरा शालीन था, द्वेष तेरा पथहीन;
प्रेम मेरा शीतलमलय, तुम थी पयसविहीन।
निष्फ़ल मेरा प्रेम है, जाना मैं रसलीन;
जीवन मेरा हो गया, जल बिन जैसे मीन।

कृमि नहीं, पशु नहीं, अधम नहीं मैं,
पापी, व्यभिचारी, कामी भी नहीं मैं।
फ़िर हे नारी! क्यों किया मुझको दुखारी?
अब रहूँगा जन्मभर मैं ब्रह्मचारी।

Friday, August 02, 2013

अब वक्त ने बदला है पासा


अब वक्त ने बदला है पासा,
बनना है लोहे से काँसा।
काँसे से बनना है सोना,
सोने से फिर कुन्दन होना।
अब समय नहीं घबराने का,
यूँ ही पत्थर बन जाने का।
गलना होगा, जलना होगा;
इन राहों पे चलना होगा।
ये राहें राह दिखायेंगी,
ये वक्त सुनहरा लायेंगी।।

जय हिन्द


है चाह कि ऐ माँ! हो तुझे फ़क्र भी मुझपर,
ये जिन्दगी कुछ तेरे लिये काम भी आये।
ये जिन्दगी है आज, रहे ये या न रहे,
पर जिन्दगी में ऐसी एक शाम भी आये।
जब बात छिड़े तेरे चहेतों की भारती,
नीचे ही सही, उसमें मेरा नाम भी आये।।

Wednesday, July 03, 2013

चल अकेला, चल अकेला


सूरज की लालिमा से रात की कालिमा तक,
पूरब से पच्छिम तक, उत्तर से दक्खिन तक,
चलता चला जाता हूँ, बस चलता चला जाता हूँ।
भूल गया राह मेरी, पथ नया बनाता हूँ,
बस चलता चला जाता हूँ।
क्या किया?
क्यूँ किया?
कब किया?
कैसे किया?
सोच नहीं पाता हूँ।
क्या गलत?
क्या सही?
क्या गगन?
क्या मही?
बस प्रश्न नया पाता हूँ।
चलता चला जाता हूँ।

छोड़कर वह पथ पुराना, भूलकर सारा ज़माना,
ज्ञान गीता का लिये जब एक पथ मैंने चुना था।
सोचता था राह होगी ये सुखद, शीतल, सरल;
पर बन चुका यह अग्निपथ, यह देखकर माथा धुना था।
मानता हूँ, राह सारी एक सी होती नहीं,
पर चलें जिसपे महाजन, पथ वही सबसे सही।
था नहीं समझा कि जब गुरुदेव का एकला सुना था।

रास्ता होगा, सही होगा, वही होगा,
साथ चलने को मगर तैयार, कोई भी नहीं होगा।
चल अकेला राह पर, तज मोह, माया, कामना;
होगी मंजिल तेरे सर, पहले तू अपना मन बना।
हारने के बाद बाजी जीतते हैं सब यहाँ,
चल अकेला, चल अकेला; पथ तू अपना खुद बना।
होगी मंजिल तेरे सर, पहले तू अपना मन बना।। 

Saturday, June 15, 2013

गर बदलना है, तो बदलेंगे, मगर खुद को

दस दिशायें घूमकर,
पर्वतशिखर को चूमकर,
नद-ताल सब को पारकर,
अधर्म का संहार कर,
क्या पा गये प्रभु आप तुम?

माना कि स्वामी हो जगत के,
करते हो तुम चिन्तन चिरंतन,
पर कहाँ बदला है कुछ?

संसार के इस पार से आकाश के उस पार तक,
पसरा हुआ अंधकार है।
सत्य, शुचि; सब मूल के प्रतिकूल,
हर तरफ़ पापाचार है।
अज्ञान है, अभिमान है, अपमान है;
पर नहीं संज्ञान है।।

दुनिया छली है, छल रही है,
अन्याय, शोषण के सहारे चल रही है।
अच्छाइयों का मान-मर्दन हो रहा है,
लगता है यूँ, भगवान जैसे सो रहा है।।

पर सोचता हूँ, कर रहे क्या खाक हम,
भगवान है तू, तो तुम्हारे बाप हम।
छलते हैं तुझको, या खुदी को छल रहे हैं,
जिस आग को माचिस दी, उसमें जल रहे हैं।।

अब वक्त है, संज्ञान हो हमको हमारी जात का,
जो कर रहे हैं, हर एक उस आघात का।
गर बदलना है, तो बदलेंगे, मगर खुद को;
ना होगी दुनिया की दुत्कार दुनिया में,
रहेंगे जब तलक हम यार दुनिया में।
रहेंगे जब तलक हम यार दुनिया में।। 

Thursday, September 27, 2012

रात गई, बात गई













रात गई, बात गई,
सपनों से इक मुलाकात गई,
तारों की इक बारात गई,
और चाँदनी उनके साथ गई।
जो चली गई, वो चली गई,
आई है अब ये सुबह नई,
ये सुबह नई आनन्दमयी,
उठ जाग मुसाफ़िर, भोर भई।।

Friday, September 14, 2012

मात्र भाषा नहीं, मातृभाषा है हिन्दी


आंग्लभाषा भी है, फ्रेंचभाषा भी है,
रूसीभाषा भी है, चीनीभाषा भी है,
भाषा सब हैं, मगर मात्र हैं;
मात्र भाषा नहीं, मातृभाषा है हिन्दी।।

प्रेम माता सा कोई भी दूजा नहीं,
मातृसेवा से बढ़कर है पूजा नहीं,
मातृभाषा की उन्नति का निश्चय करो;
ज्ञान के साथ संस्कृति का संचय करो।।

Sunday, December 04, 2011


वो नज़र दो-चार थी, या इश्क की रफ़्तार थी,
चौदहवीं का चाँद थी, पहली नज़र का प्यार थी;
जो भी थी वो दिलनशीं, अपनी समझ के पार थी।

हम मिले पहली दफ़ा, जब शाम थोदी सर्द थी,
देखकर उसको वहीं ठिठके हुए से रह गये;
चाहते कहना बहुत थे, मन ही मन में कह गये।

वो मगर मशगूल थी अपनी ही सी कुछ बात में,
हम खड़े थे दूर और वो थी सखी के साथ में।
फ़िर  ये दिखना रोज़ की आदत में शामिल हो गया;
उसकी इक मुस्कान का शागिर्द ये दिल हो गया।

चाहते तो थे पर मिल ना सके,
ना हिम्मत हुई कि कुछ कह सकें।
फ़िर  एक दिन किस्मत रंग लाई,
उसने हमें देखा और वो मुस्कुराई।

किसी बहाने से ही सही जान-पहचान हो गई,
और फ़िर  वो भीड़ में ना जाने कहाँ खो गई।

फ़िर  हम मिले एक अरसे बाद,
और अबकी जो मिले तो मिलते ही रहे।
दिल में अरमानों के नित-नये फूल खिलते ही रहे।

खैर छोड़िये इसे यहीं विराम देते हैं,
इस कविता को क्या नाम दें, ये तो सोचा नहीं,
पर यहाँ लौट के जरूर आयेंगे।

आना ही पड़ेगा,
आखिर कविता जो अधूरी है।