अभिव्यक्ति

Sunday, April 12, 2009

प्रेम

शुकदेव और काग प्रभु की चर्चा अत्यन्त महान,
खिल जाते है रोम सारे सिंचित होते प्राण ।
एक प्रात जब प्रश्न जगत हित काग प्रभु ने छेड़ा,
शुक के मुख से उत्तर सुनकर उदगत हुआ सवेरा।।


प्रश्न काग का उत्तम था,
क्यों राधा श्याम कहाए जबकि विवाह श्याम निज मति से रुक्मणि संग कराये।
प्रभु शुक ने उत्तर तब दीन्हा,
सुनहु काग मुनिराज ! प्रेम अभीष्ट प्रेम अवलंबित प्रेम जीव बड़भाग।
प्रेम काम का पुंज नहीं, है प्रेम प्रकृति का रूप;
प्रेम प्रकृति के इस वर्णन में राधा दिव्या स्वरुप।
प्रेम सदा परिणत हो विधिवत जगत मान्य परिणय में,
यह आवश्यक नहीं किंतु इतना निश्चित आशय में।
प्रेम सदा उद्दीप्त रहेगा प्रेम सदा उत्कृष्ट,
प्रेम भाव का सानी जग में कहीं नहीं अन्यत्र।।


प्रेम नहीं वो किंचित जिसमें लेश मात्र भी छल है,
प्रेम समर्पण प्रेम भावना प्रेम अतीव सरल है।
यों तो जीव सकल हैं जीते इस जग के आश्रय में ;
लेकिन जीवन सफल वही जो बीते प्रेम प्रणय में ॥

-- आदित्य कुमार तिवारी < नवम्बर २००६ >


( ये कविता मैंने उस समय लिखी थी, जब मै अपने अभियांत्रिकी तृतीय वर्ष में था और उद्योगनगरी एक्सप्रेस से मुंबई से कानपुर वापस लौट रहा था। )

परम्परा

जीभ का काम सिर्फ़ बोलना नहीं होता,
हाथ का काम सिर्फ़ सामान उठाना नहीं होता,
पैर का काम सिर्फ़ चलना नहीं होता,
शरीर का काम सिर्फ़ बोझ उठाना नहीं होता।

जीभ हरिश्चंद्र की,
जिसने जीवन भर सिर्फ़ सत्य का साथ दिया।
हाथ एकलव्य का,
जिसने गुरु दक्षिणा में अंगूठा दान दे दिया।
पैर महात्मा गांधी के,
जिन्होंने अंग्रेजो को भारत से निकालकर ही दम लिया।
शरीर दधीचि का,
जिन्होंने देवहित अपनी अस्थियों को दान कर दिया।

भीड़ के साथ तो सभी चलते रहते हैं;
पर जो कल का साथ दे, परम्परा उसे कहते हैं।


( ये कविता मैंने कोई ६-७ वर्ष पहले लिखी थी, आज एक दैनन्दिनी में मिल गयी। )

Monday, September 24, 2007

काहे रे मन धीर ना धरे

काहे रे मन धीर ना धरे,
जो बस आवे सो ही करे।
मन-ही-मन ये सहज मुसकावे,
मन-ही-मन किस-किस पे मरे।।

मन बस होय राम, सिय भायी,
कान्हा ने रुक्मिणी भगायी।
मेरो मन भी यही विचरै,
जदपि बिबस कि करे तो क्या करे।।

बालकाल सखियाँ अति भायीं,
तरुणाई सब जग सुखदायी।
पर म्हारी छबि पे कोऊ ना मरै,
अब हमहूँ कितने जतन करैं।।

मोरी प्रेम ब्यथा सुनौ,
राधा नागरि सोइ।
हमरे किये तो कछू ना हुइहै,
अब तुम्हरे किये ही होइ।।

जीवन-संग्राम

रात अब जाने को है,
फ़िर सुबह आने को है।
ढल गया था कल जो सूरज,
आग बरसाने को है।।

जो अभी था डूबता सा,
आ गया अब नाव पर।
तप्त रेती की लपट से,
घने वन की छाँव पर।।

कब कहीं रोके रुकी है,
अग्नि, जल की धार से।
बच सका कब कोई जीवन,
सर्प-विष-फ़ुँकार से।।

जूझकर लड़ना समय से,
ज़िन्दगी का काम है।
मौत को भी दे चुनौती,
ज़िन्दगी संग्राम है।।

Monday, March 12, 2007

मेरी प्रियतमा

आज एक ख्वाब देखा है मैंने,
ख्वाब अपनी आँखों में सपने बोने का,
और फ़िर लम्हा-दर-लम्हा उन सपनों को सींचते हुए,
एक नयी सुबह का इन्तजार करना।

बड़ा अजीब है यह सब,
कुछ रोज़ पहले उससे मैं पहली बार मिला था,
यहीं किसी छाँव के नीचे,
फ़िर कुछ मुलाकातों में ना जाने क्या हो गया।

आज कुछ नही सुहाता बगैर उसके,
हर पल जाने क्यूँ उसकी ही याद सताती है,
कुछ दिन पहले तक जिसे मैं जानता भी नहीं था,
आज वही मेरी हर पल की साथी है।

पर यह तो केवल अर्ध-सत्य है,
पूर्ण-सत्य तो तब होता जब वो भी कुछ कहती,
नहीं जानता हूँ क्या है उसके मन में,
कुछ है भी या कुछ भी नही।

पर शायद हिम्मत भी नही है यह पूछ पाने की,
किस हक से मैं उससे ये पूछूँ।
कोई तो अधिकार नही मेरा उस पर,
पर मेरा तो खुद पर भी अधिकार नही रहा अब।

मेरी आँखों में बस उसका सपना है,
मेरे होठों पर उसकी हँसी।
मेरा हर पल अब बस उसका ही है,
वही है मेरी प्रियतमा उर्वशी।।

Friday, February 02, 2007

चुलबुली लड़की

जब हँसती है,
अपनी हँसी से सारा जग हरसाती है।
इक चुलबुली लड़की।

जब वो रोती है,
मुझको भी संग में रुलाती है।
इक चुलबुली लड़की।

जब मुझसे बातें करती है,
लगता है बस इसकी बातों में बस जाऊँ।
जब वो उलझे बाल सँवारे,
मैं कंघी बनकर के बालों में फ़ँस जाऊँ।

लेकिन मैं मजबूर बहुत हूँ,
सच्चाई से दूर बहुत हूँ।
जिस चुलबुली लड़की ने मेरा दिल भरमाया है,
वो मेरी कल्पना है, निरी माया है।

पर अपनी इस कल्पना के साथ मैंने जी है जिन्दगी,
औरों के लिये रहस्य, लेकिन मेरी यही है जिन्दगी।

Wednesday, January 31, 2007

थक गया हूँ बहुत...आज सोता हूँ मैं

आज मुझे सो लेने दो,
दिन भर का थका हुआ हूँ;
नींद में ही सही रो लेने दो।।

जब उसका कोई सहारा ना था,
वो किसी का भी इतना दुलारा ना था;
तब सहारा दिया था उसे एक दिन।।

उसके आँसू गिरे जब भी, रोया हूँ मैं,
उसकी हर आह पर एक आवाज की;
उसको जीने की हर पल नसीहत भी दी।।

आज खुश है वही और रोता हूँ मैं,
उसको चिन्ता नहीं एक पल के लिये;
अपने आँसू से पत्थर भिगोता हूँ मैं।।

गम की दुनिया में गम के ही साये मिले,
दोसत जितने भी ढूँढे पराये मिले,
एक मुद्दत से हूँ राह पर मैं खड़ा;
लोग जितने भी देखे,सताये मिले।।

गम नहीं रीत है ये ही संसार की,
क्षुद्रता है यही स्वार्थ व्यापार की,
किन्तु फिर भी तिमिर को सँजोता हूँ मैं;
थक गया हूँ बहुत,आज सोता हूँ मैं।।

Monday, November 27, 2006

हम हम हैं...

हम हम हैं,
इस बात में दम हैं,
क्लास हम नहीं जाते तो फिर करते क्या हैं?
लाइब्रेरी को आज भी हमारा इन्तजार है।
प्रोफ़ेसर हमारी एक झलक देखने को बेकरार है।।
और हम, हम इतने बड़े मक्कार हैं,
24 घन्टे हमें इस सड़ेले से ओरकुट का बुखार है।।


पहले हमें होम सिकनेस ने सताया था,
अब घर से दूरियों ने बहकाया है,
हमने ज़माने में सबसे प्यार किया,
पर जिससे भी इजहार किया,
उसने हमें रुलाया है।।


अन्दर से हम स्वीट ऐन्ड सोफ़्ट हैं,
बट बाहर से थोड़े टेक्निकल फ़ाल्ट लगते हैं,
अजी छोड़िये भी यह सब तो केवल बातें हैं,
हम लड़कियों को मिस इण्डिया कहते नहीं थकते,
उन्हें हम सेल का माल नज़र आते हैं।।


सारी जिन्दगी हमें हमारी गलतफ़हमियों ने बहकाया,
हमने ह्यूमर लाया तो लोगों ने हमको मामू बनाया है,
हम भारत की मिट्टी की अनुपम खोज हैं,
लोग कहते नहीं थकते हम धरती का बोझ हैं।।


बट अब जो हैं सो हैं,
हमारी सोच सबसे अलग है तो क्या हुआ,
वो तो हम मानवता के मनु नहीं बने,
वरना मनु अकेला जिन्दा बचा था,और कुछ जानवर भी बचाये थे,
हम तो खुद से क्या उम्मीद रखें,उन जानवरों को भी डुबाते।
अब तो गली के कुत्ते हम पर भौंकने से भी इनकार करते है,
हमारे हाथों से मच्छर भी नहीं मरते हैं।।



यहाँ तक ही होता तो भी गनीमत थी,
भगवान ने तो हमें सीरियसली लेना ही बन्द कर दिया है,
कल ही किसी ने ऐश की हमसे बात चलयी,
और रात को ही ऐश अभिषेक की सगाई हो गयी,
दिल ने किसी और का नाम लेकर धड़कना शुरु किया,
तो उसको भी हममें एक भाई ही नज़र आया।।


हम मानवता की मशाल के बुझे हुए अवतार है,
हम भारत की बूढ़ी आँखों की आखिरी होप हैं,
और युवा भारत की पहली पीढ़ी के कन्ज्यूमेबल आइटम,
बस बस अब और नहीं लिख सकता,
कयोंकि मेरे पास शब्द नही बचे,
शब्द कहीं गुम गये हैं हमारे स्पेयर पार्टस की तरह।।


जब ये वापस मिलेंगे तब शायद फिर लिखूँ।
फ़िलहाल तो ऐसे ही हैं हम।।

Thursday, October 12, 2006

वो सुबह कब आयेगी...

सुबह जब ओस गहराती है,
फिर वही बात याद आती है,
वो चाँद का ढलना,
वो सूरज का आना,
वो कनखियों से फूलों का मुस्कुराना,
पर क्यों नहीं लगता ये सब उतना सुहाना,
जितना तब था,
क्यों फूल चुभते हैं हृदय के पोरों पर,
क्यों सूरज हरे कर देता है घाव सीने के,
क्यों सुई सी चुभती है ये सुबह,
क्या था तुम्हारी उस मुस्कान मे,
कि जब तुम मुस्कुराती थी,
ये सारा आसमान अपना सा लगता था,
जब तुम पलकें झपकाती थी,
लगता था जैसे सारा जहान मेरे साथ है,
पर फिर एक दिन अचानक तुम मुझे छोड़कर चली गयी,
तुम नही आयी,
पर तुम्हारी खबर आयी,
ऐसी भी क्या मजबूरियाँ थी,
कि मुझसे बेवफ़ाई की तुमने,
अब तुम तो जैसे तैसे जी ही रही होगी,
पर मैं जानता हूँ अपनी ज़िन्दगी को,
बिना साँस के जीना क्या होता है,
बिना एहसास के जीना क्या होता है,
पर फिर भी जी रहा हूँ मैं,
बस एक आस के साथ,
उस सुबह के इंतज़ार में।