Sunday, December 04, 2011


वो नज़र दो-चार थी, या इश्क की रफ़्तार थी,
चौदहवीं का चाँद थी, पहली नज़र का प्यार थी;
जो भी थी वो दिलनशीं, अपनी समझ के पार थी।

हम मिले पहली दफ़ा, जब शाम थोदी सर्द थी,
देखकर उसको वहीं ठिठके हुए से रह गये;
चाहते कहना बहुत थे, मन ही मन में कह गये।

वो मगर मशगूल थी अपनी ही सी कुछ बात में,
हम खड़े थे दूर और वो थी सखी के साथ में।
फ़िर  ये दिखना रोज़ की आदत में शामिल हो गया;
उसकी इक मुस्कान का शागिर्द ये दिल हो गया।

चाहते तो थे पर मिल ना सके,
ना हिम्मत हुई कि कुछ कह सकें।
फ़िर  एक दिन किस्मत रंग लाई,
उसने हमें देखा और वो मुस्कुराई।

किसी बहाने से ही सही जान-पहचान हो गई,
और फ़िर  वो भीड़ में ना जाने कहाँ खो गई।

फ़िर  हम मिले एक अरसे बाद,
और अबकी जो मिले तो मिलते ही रहे।
दिल में अरमानों के नित-नये फूल खिलते ही रहे।

खैर छोड़िये इसे यहीं विराम देते हैं,
इस कविता को क्या नाम दें, ये तो सोचा नहीं,
पर यहाँ लौट के जरूर आयेंगे।

आना ही पड़ेगा,
आखिर कविता जो अधूरी है।



Saturday, October 01, 2011

प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया


हमने आँखों में सौ सपने सजाये ,
उसे देखा और हम मुस्कराये।
गलती बस इतनी की उसे अपना मान बैठे,
जो बूझे नहीं अब तक वही सपना मान बैठे।

करते भी तो क्या, ये दिल ही तो है,
और फ़िर दिल तो बच्चा है जी।
हम समझे दिल्लगी ही सही;
जो भी है अच्छा है जी।

माना हम अच्छे थे, सच्चे थे;
लेकिन अकल से एकदम कच्चे थे।
दिल्ली को हमारी ये दिल्लगी रास नहीं आई,
लग गई नज़र। 

लड़की ने पता नहीं दिल लगाया भी या नहीं,
कमबख्त हम पर तो आिशकी का फ़ितूर था।
हम थक गये उसके घर के चक्कर लगाते-लगाते;
और वो बोली तुम हमको ज़रा भी रास नहीं आते।

अब इश्क का भी अज़ब दस्तूर है,
जब लगने पे आती है, तो लग ही जाती है।
ज़ख्म बहुत गहरा हुअ, वक्त लगता सा था ठहरा हुआ;
ऐसे फ़ँसे मायाज़ाल में कि न माया मिली न छाया।
हमको अपने इस हाल पे जमकर रोना आया।

रोये, खूब रोये और क्यूँ न रोते;
अपने ही करम धो रहे थे।
तय कर लिया प्यार, मोहब्बत, इश्क का मीठा-मीठा रिस्क अब नहीं सहना;
इतने टार्चर से बेहतर है चैन से अकेले रहना।।

Thursday, February 17, 2011

बीती ताहि बिसार दे...

आज फ़िर वही बात याद आती है,
फ़िर से वो दिन-रात याद आती है।
हर बात भुला सकता है मन किन्तु,
हर बिसरी हुई बात फ़िर याद आती है।

सब कुछ दिख रहा है साफ़-साफ़,
फ़िर आँखें क्यूँ धुँधलके में रहना चहती हैं।
खुश रहना कितना सरल सा है;
फ़िर क्यूँ ये पलकें बरबस ही बहना चाहती हैं।

मन में एक अजब सा सन्तोष है,
चित्त में एक सुलगती सी ज्वाला है।
जो पीयूष-सुधा बन जीवन दे सकता था;
वो बन बैठा विष का प्याला है।

खैर अब जो भी है, जैसा भी है,
उसे उसी रूप में स्वीकार करना है।
राह में फ़ूल आयें या काँटे;
सबको समभाव से पार करना है।।

मृत्युपर्व

मृत्यु सत्य है जीवन का,
या जीवन मरता नहीं कभी।
कहने को आदर्श खोखले,
निन्दा करता नहीं कभी।।

मेरा जीवन मेरा है, ईश्वर! फ़िर तेरा, कया तेरा;
जब नहीं मानता ईश्वर को, फ़िर क्यूँ कहता ईश्वर मेरा।
एक देव एक दानव मन में सदा बसाये हम रहते,
जब जिसकी मर्जी चलती अपना-अपना दोनों कहते।

सत्य कटु है, किन्तु अटल है, दानव मरता नहीं कभी;
हाँ, सम्भव है देव कदाचित मर जाये। 
दानव हर पल हर क्षण तत्पर रहता है,
ये भी सम्भव है देव कभी कुछ कर जाये।

मैं नहीं कह रहा दानव शक्तिशाली है,
पर क्यूँ हमने देवों से शत्रुता पाली है।
अन्धा दानव कितनी भी शक्ति दिखा जाये,
पर ये भी तय है कि प्रकाश भी आएगा।
माना ताकत है दानव की चतुराई में,
पर कब तक वो भी देव से खैर मनाएगा।

 सतयुग, त्रेता,द्वापर से कलि तक हम निकले,
उतना ही आगे देवों से दानव निकले।
पहले देवों में भी मानव सम्मानित था;
अब तो मानव, दानव से भी दानव निकले।

पर वाह विधाता! तू भी कम चालाक नहीं,
तेरे आगे चल सकी किसी की धाक नहीं।
जैसे-जैसे हम एक-एक युग बढ़ते गये;
तुम मानव की आयु कम, और कम करते गये।

है मृत्यु, विजयदशमी देवों की दानव पर,
अच्छा अंकुश कस रखा है तुमने मानव पर।
यूँ तो मृत्यु का दर्द अतीव ही भारी है,
पर फ़िर भी यही अमोघ अमंगलहारी है।

मानव के अन्दर का दानव, यदि मानव मार सका होता,
तब सम्भव है यह अटल सत्य झुठला जाता।
जीने की इच्छा यदि वह करता देवों सी;
तो इस बन्धन से स्वत: मुक्ति वह पा जाता।

रघुनाथ! मुझे इतनी क्षमता तो दे देना,
अपनी मृत्यु से पहले मृत्युपर्व कर लूँ।
इस बार विजयदशमी जब आये तब आये;
मन के रावण पर अपनी राम-विजय कर लूँ।।

- आदित्य कुमार तिवारी (20 जनवरी, 2008)




Sunday, April 12, 2009

प्रेम

शुकदेव और काग प्रभु की चर्चा अत्यन्त महान,
खिल जाते है रोम सारे सिंचित होते प्राण ।
एक प्रात जब प्रश्न जगत हित काग प्रभु ने छेड़ा,
शुक के मुख से उत्तर सुनकर उदगत हुआ सवेरा।।


प्रश्न काग का उत्तम था,
क्यों राधा श्याम कहाए जबकि विवाह श्याम निज मति से रुक्मणि संग कराये।
प्रभु शुक ने उत्तर तब दीन्हा,
सुनहु काग मुनिराज ! प्रेम अभीष्ट प्रेम अवलंबित प्रेम जीव बड़भाग।
प्रेम काम का पुंज नहीं, है प्रेम प्रकृति का रूप;
प्रेम प्रकृति के इस वर्णन में राधा दिव्या स्वरुप।
प्रेम सदा परिणत हो विधिवत जगत मान्य परिणय में,
यह आवश्यक नहीं किंतु इतना निश्चित आशय में।
प्रेम सदा उद्दीप्त रहेगा प्रेम सदा उत्कृष्ट,
प्रेम भाव का सानी जग में कहीं नहीं अन्यत्र।।


प्रेम नहीं वो किंचित जिसमें लेश मात्र भी छल है,
प्रेम समर्पण प्रेम भावना प्रेम अतीव सरल है।
यों तो जीव सकल हैं जीते इस जग के आश्रय में ;
लेकिन जीवन सफल वही जो बीते प्रेम प्रणय में ॥

-- आदित्य कुमार तिवारी < नवम्बर २००६ >


( ये कविता मैंने उस समय लिखी थी, जब मै अपने अभियांत्रिकी तृतीय वर्ष में था और उद्योगनगरी एक्सप्रेस से मुंबई से कानपुर वापस लौट रहा था। )

परम्परा

जीभ का काम सिर्फ़ बोलना नहीं होता,
हाथ का काम सिर्फ़ सामान उठाना नहीं होता,
पैर का काम सिर्फ़ चलना नहीं होता,
शरीर का काम सिर्फ़ बोझ उठाना नहीं होता।

जीभ हरिश्चंद्र की,
जिसने जीवन भर सिर्फ़ सत्य का साथ दिया।
हाथ एकलव्य का,
जिसने गुरु दक्षिणा में अंगूठा दान दे दिया।
पैर महात्मा गांधी के,
जिन्होंने अंग्रेजो को भारत से निकालकर ही दम लिया।
शरीर दधीचि का,
जिन्होंने देवहित अपनी अस्थियों को दान कर दिया।

भीड़ के साथ तो सभी चलते रहते हैं;
पर जो कल का साथ दे, परम्परा उसे कहते हैं।


( ये कविता मैंने कोई ६-७ वर्ष पहले लिखी थी, आज एक दैनन्दिनी में मिल गयी। )

Monday, September 24, 2007

काहे रे मन धीर ना धरे

काहे रे मन धीर ना धरे,
जो बस आवे सो ही करे।
मन-ही-मन ये सहज मुसकावे,
मन-ही-मन किस-किस पे मरे।।

मन बस होय राम, सिय भायी,
कान्हा ने रुक्मिणी भगायी।
मेरो मन भी यही विचरै,
जदपि बिबस कि करे तो क्या करे।।

बालकाल सखियाँ अति भायीं,
तरुणाई सब जग सुखदायी।
पर म्हारी छबि पे कोऊ ना मरै,
अब हमहूँ कितने जतन करैं।।

मोरी प्रेम ब्यथा सुनौ,
राधा नागरि सोइ।
हमरे किये तो कछू ना हुइहै,
अब तुम्हरे किये ही होइ।।

जीवन-संग्राम

रात अब जाने को है,
फ़िर सुबह आने को है।
ढल गया था कल जो सूरज,
आग बरसाने को है।।

जो अभी था डूबता सा,
आ गया अब नाव पर।
तप्त रेती की लपट से,
घने वन की छाँव पर।।

कब कहीं रोके रुकी है,
अग्नि, जल की धार से।
बच सका कब कोई जीवन,
सर्प-विष-फ़ुँकार से।।

जूझकर लड़ना समय से,
ज़िन्दगी का काम है।
मौत को भी दे चुनौती,
ज़िन्दगी संग्राम है।।

Monday, March 12, 2007

मेरी प्रियतमा

आज एक ख्वाब देखा है मैंने,
ख्वाब अपनी आँखों में सपने बोने का,
और फ़िर लम्हा-दर-लम्हा उन सपनों को सींचते हुए,
एक नयी सुबह का इन्तजार करना।

बड़ा अजीब है यह सब,
कुछ रोज़ पहले उससे मैं पहली बार मिला था,
यहीं किसी छाँव के नीचे,
फ़िर कुछ मुलाकातों में ना जाने क्या हो गया।

आज कुछ नही सुहाता बगैर उसके,
हर पल जाने क्यूँ उसकी ही याद सताती है,
कुछ दिन पहले तक जिसे मैं जानता भी नहीं था,
आज वही मेरी हर पल की साथी है।

पर यह तो केवल अर्ध-सत्य है,
पूर्ण-सत्य तो तब होता जब वो भी कुछ कहती,
नहीं जानता हूँ क्या है उसके मन में,
कुछ है भी या कुछ भी नही।

पर शायद हिम्मत भी नही है यह पूछ पाने की,
किस हक से मैं उससे ये पूछूँ।
कोई तो अधिकार नही मेरा उस पर,
पर मेरा तो खुद पर भी अधिकार नही रहा अब।

मेरी आँखों में बस उसका सपना है,
मेरे होठों पर उसकी हँसी।
मेरा हर पल अब बस उसका ही है,
वही है मेरी प्रियतमा उर्वशी।।

Friday, February 02, 2007

चुलबुली लड़की

जब हँसती है,
अपनी हँसी से सारा जग हरसाती है।
इक चुलबुली लड़की।

जब वो रोती है,
मुझको भी संग में रुलाती है।
इक चुलबुली लड़की।

जब मुझसे बातें करती है,
लगता है बस इसकी बातों में बस जाऊँ।
जब वो उलझे बाल सँवारे,
मैं कंघी बनकर के बालों में फ़ँस जाऊँ।

लेकिन मैं मजबूर बहुत हूँ,
सच्चाई से दूर बहुत हूँ।
जिस चुलबुली लड़की ने मेरा दिल भरमाया है,
वो मेरी कल्पना है, निरी माया है।

पर अपनी इस कल्पना के साथ मैंने जी है जिन्दगी,
औरों के लिये रहस्य, लेकिन मेरी यही है जिन्दगी।