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Why Should I be Good?

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Team Name: Maximus Dramaticus Read the previous part here:  Past Diaries Open Up “Well. It’s a haunting story. A story that will kill all the goodness that still remains in your heart. Would you still want to know? Are you sure? Are you? I won’t keep any secrets except the secret itself. Ha ha!! No pun intended. But why should I? Have you ever cared about me? Rather leave me aside, have you ever cared about a roadside beggar in the truest sense. What moral rights do you have to dictate your terms and they have nothing else, but to live accordingly? Indiaaaaaaaaaaaaaaah…!! We are such a huge country with 1.2 billion population but who owns all the money? The aspiring and successful people like you. And what do people like me get? Nothing except the disrespect that you throw at us. You want to hire me for a night for your sensual pleasure? Not anymore, you bastard, not anymore! I will change the rules of the world!! Do you get t...

आख़िर किसे फ़र्क पड़ता है..

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वो हर एक शख्स जो मुझे आजमाता है, क्या वो मुझे जानता भी है? जिस कदर खेलता है मुझसे, क्या पहचानता भी है? अपनी मर्ज़ी से मुझे छूता है, छेड़ता है, कचोटता है; प्यार भी दिखाता है और नफ़रत भी करता है | जब मन आता है, अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है, और नुकसान के डर से छोड़ भी देता है | चाहे नर हो या मादा, सबका है दोष आधा-आधा; आख़िर मैं हूँ क्या ? क्यों मुझे हरदम नीलाम करते हो? जब खुद पर बन आती है, आख़िर तभी क्यूँ डरते हो? कहते सब मुझे अपना हैं, मानता कोई भी नहीं | मैं सबका अपना निजी स्वार्थ हूँ | मैं वो सच हूँ, जिसका अपना एक बाजार है | मैं वो सच हूँ, जिसका चल रहा व्यापार है | मैं वो सच हूँ, जो आज भ्रष्टाचार है | मैं वो सच हूँ, जो सचमुच बहुत बीमार है | मैं वो सच हूँ, जिसे बोलने वाला मरता है | मैं वो सच हूँ, जिसे बोलने से पहले एक इंसान सौ बार सबर करता है | मैं वो सच हूँ, जिसको बोलने का साहस लोगों में कहीं खो गया है | मैं वो सच हूँ, जो अब बर्दाश्त के बाहर हो गया है | पर अब जो हूँ, जैसा हूँ, हूँ तो आख़िर सच, तो बोलूँगा भी वही...

I Warned You!

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Team Name: Maximus Dramaticus Read the previous part here: The Warning “I warned you, you nasty bastard!” Shouted the lady clad in white standing behind him. She was holding a razor in her hand, soaked in deep red blood. It was the same lady whom Cyrus saw the other day. The sight was terrifying, the silence of the night was deafening. His heart sank with fear of death and he wanted to scream, but his voice betrayed him. His face turned pale, he stumbled and hit his head on the basin and fell unconscious on the floor. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ Cyrus woke to the irritating sound of Alarm ringing somewhere. He so wished that someone switches off that irritating sound, but it continued ringing. He was lying on his washroom floor. He tried to search the source of the sound as it was coming from somewhere in the washroom itself. The irritating sound persisted. It was his cell phone ringing alongside the basin. He tried to stand up but he felt unbearabl...

मधु मुक्तक

बंद अभी करता मधुशाला, अब न पियूंगा बिल्कुल हाला| साकी की आँखें प्यासी हैं, हा! ये मैने क्या कर डाला| ********** नशे में बोलती हैं आदमी के दिल की आवाज़ें, होशवालों की ज़ुबान में आवाज़ नहीं होती | ********** तेरी नज़रों के पैमाने लुढ़क गये हम पर, वरना हम यूँ नशा नहीं करते | ********** कल जो लब से पिलाई थी उसने, हम अभी भी उसी असर में हैं | ********** सुबह सुबह बोतल शराब की बातें, ये तेरी इंक़लाब की बातें; होश आएगा भूल जाएगा, हैं ये सारी ही ख्वाब की बातें | **********

ब्रह्मचारी की अन्तर्व्यथा

इक लौ देखा जब तुझे भरकर दिल में प्यार, इक लौ जल उठी प्रेम की, हरसा दिल इक बार। इक लौ मेरे प्रेम से तोड़ी तूने तार, इक लौ ही काफ़ी तुझे करने को रतनार। प्रेम मेरा शालीन था, द्वेष तेरा पथहीन; प्रेम मेरा शीतलमलय, तुम थी पयसविहीन। निष्फ़ल मेरा प्रेम है, जाना मैं रसलीन; जीवन मेरा हो गया, जल बिन जैसे मीन। कृमि नहीं, पशु नहीं, अधम नहीं मैं, पापी, व्यभिचारी, कामी भी नहीं मैं। फ़िर हे नारी! क्यों किया मुझको दुखारी? अब रहूँगा जन्मभर मैं ब्रह्मचारी।

अब वक्त ने बदला है पासा

अब वक्त ने बदला है पासा, बनना है लोहे से काँसा। काँसे से बनना है सोना, सोने से फिर कुन्दन होना। अब समय नहीं घबराने का, यूँ ही पत्थर बन जाने का। गलना होगा, जलना होगा; इन राहों पे चलना होगा। ये राहें राह दिखायेंगी, ये वक्त सुनहरा लायेंगी।।

जय हिन्द

है चाह कि ऐ माँ! हो तुझे फ़क्र भी मुझपर, ये जिन्दगी कुछ तेरे लिये काम भी आये। ये जिन्दगी है आज, रहे ये या न रहे, पर जिन्दगी में ऐसी एक शाम भी आये। जब बात छिड़े तेरे चहेतों की भारती, नीचे ही सही, उसमें मेरा नाम भी आये।।

चल अकेला, चल अकेला

सूरज की लालिमा से रात की कालिमा तक, पूरब से पच्छिम तक, उत्तर से दक्खिन तक, चलता चला जाता हूँ, बस चलता चला जाता हूँ। भूल गया राह मेरी, पथ नया बनाता हूँ, बस चलता चला जाता हूँ। क्या किया? क्यूँ किया? कब किया? कैसे किया? सोच नहीं पाता हूँ। क्या गलत? क्या सही? क्या गगन? क्या मही? बस प्रश्न नया पाता हूँ। चलता चला जाता हूँ। छोड़कर वह पथ पुराना, भूलकर सारा ज़माना, ज्ञान गीता का लिये जब एक पथ मैंने चुना था। सोचता था राह होगी ये सुखद, शीतल, सरल; पर बन चुका यह अग्निपथ, यह देखकर माथा धुना था। मानता हूँ, राह सारी एक सी होती नहीं, पर चलें जिसपे महाजन, पथ वही सबसे सही। था नहीं समझा कि जब गुरुदेव का एकला सुना था। रास्ता होगा, सही होगा, वही होगा, साथ चलने को मगर तैयार, कोई भी नहीं होगा। चल अकेला राह पर, तज मोह, माया, कामना; होगी मंजिल तेरे सर, पहले तू अपना मन बना। हारने के बाद बाजी जीतते हैं सब यहाँ, चल अकेला, चल अकेला; पथ तू अपना खुद बना। होगी मंजिल तेरे सर, पहले तू अपना मन बना।। 

गर बदलना है, तो बदलेंगे, मगर खुद को

दस दिशायें घूमकर, पर्वतशिखर को चूमकर, नद-ताल सब को पारकर, अधर्म का संहार कर, क्या पा गये प्रभु आप तुम? माना कि स्वामी हो जगत के, करते हो तुम चिन्तन चिरंतन, पर कहाँ बदला है कुछ? संसार के इस पार से आकाश के उस पार तक, पसरा हुआ अंधकार है। सत्य, शुचि; सब मूल के प्रतिकूल, हर तरफ़ पापाचार है। अज्ञान है, अभिमान है, अपमान है; पर नहीं संज्ञान है।। दुनिया छली है, छल रही है, अन्याय, शोषण के सहारे चल रही है। अच्छाइयों का मान-मर्दन हो रहा है, लगता है यूँ, भगवान जैसे सो रहा है।। पर सोचता हूँ, कर रहे क्या खाक हम, भगवान है तू, तो तुम्हारे बाप हम। छलते हैं तुझको, या खुदी को छल रहे हैं, जिस आग को माचिस दी, उसमें जल रहे हैं।। अब वक्त है, संज्ञान हो हमको हमारी जात का, जो कर रहे हैं, हर एक उस आघात का। गर बदलना है, तो बदलेंगे, मगर खुद को; ना होगी दुनिया की दुत्कार दुनिया में, रहेंगे जब तलक हम यार दुनिया में। रहेंगे जब तलक हम यार दुनिया में।। 

रात गई, बात गई

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रात गई, बात गई, सपनों से इक मुलाकात गई, तारों की इक बारात गई, और चाँदनी उनके साथ गई। जो चली गई, वो चली गई, आई है अब ये सुबह नई, ये सुबह नई आनन्दमयी, उठ जाग मुसाफ़िर, भोर भई।।

मात्र भाषा नहीं, मातृभाषा है हिन्दी

आंग्लभाषा भी है, फ्रेंचभाषा भी है, रूसीभाषा भी है, चीनीभाषा भी है, भाषा सब हैं, मगर मात्र हैं; मात्र भाषा नहीं, मातृभाषा है हिन्दी।। प्रेम माता सा कोई भी दूजा नहीं, मातृसेवा से बढ़कर है पूजा नहीं, मातृभाषा की उन्नति का निश्चय करो; ज्ञान के साथ संस्कृति का संचय करो।।
वो नज़र दो-चार थी, या इश्क की रफ़्तार थी, चौदहवीं का चाँद थी, पहली नज़र का प्यार थी; जो भी थी वो दिलनशीं, अपनी समझ के पार थी। हम मिले पहली दफ़ा, जब शाम थोदी सर्द थी, देखकर उसको वहीं ठिठके हुए से रह गये; चाहते कहना बहुत थे, मन ही मन में कह गये। वो मगर मशगूल थी अपनी ही सी कुछ बात में, हम खड़े थे दूर और वो थी सखी के साथ में। फ़िर  ये दिखना रोज़ की आदत में शामिल हो गया; उसकी इक मुस्कान का शागिर्द ये दिल हो गया। चाहते तो थे पर मिल ना सके, ना हिम्मत हुई कि कुछ कह सकें। फ़िर  एक दिन किस्मत रंग लाई, उसने हमें देखा और वो मुस्कुराई। किसी बहाने से ही सही जान-पहचान हो गई, और फ़िर  वो भीड़ में ना जाने कहाँ खो गई। फ़िर  हम मिले एक अरसे बाद, और अबकी जो मिले तो मिलते ही रहे। दिल में अरमानों के नित-नये फूल खिलते ही रहे। खैर छोड़िये इसे यहीं विराम देते हैं, इस कविता को क्या नाम दें, ये तो सोचा नहीं, पर यहाँ लौट के जरूर आयेंगे। आना ही पड़ेगा,...

प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया

हमने आँखों में सौ सपने सजाये , उसे देखा और हम मुस्कराये। गलती बस इतनी की उसे अपना मान बैठे, जो बूझे नहीं अब तक वही सपना मान बैठे। करते भी तो क्या, ये दिल ही तो है, और फ़िर दिल तो बच्चा है जी। हम समझे दिल्लगी ही सही; जो भी है अच्छा है जी। माना हम अच्छे थे, सच्चे थे; लेकिन अकल से एकदम कच्चे थे। दिल्ली को हमारी ये दिल्लगी रास नहीं आई, लग गई नज़र।  लड़की ने पता नहीं दिल लगाया भी या नहीं, कमबख्त हम पर तो आिशकी का फ़ितूर था। हम थक गये उसके घर के चक्कर लगाते-लगाते; और वो बोली तुम हमको ज़रा भी रास नहीं आते। अब इश्क का भी अज़ब दस्तूर है, जब लगने पे आती है, तो लग ही जाती है। ज़ख्म बहुत गहरा हुअ, वक्त लगता सा था ठहरा हुआ; ऐसे फ़ँसे मायाज़ाल में कि न माया मिली न छाया। हमको अपने इस हाल पे जमकर रोना आया। रोये, खूब रोये और क्यूँ न रोते; अपने ही करम धो रहे थे। तय कर लिया प्यार, मोहब्बत, इश्क का मीठा-मीठा रिस्क अब नहीं सहना; इतने टार्चर से बेहतर है चैन से अकेले रहना।।

बीती ताहि बिसार दे...

आज फ़िर वही बात याद आती है, फ़िर से वो दिन-रात याद आती है। हर बात भुला सकता है मन किन्तु, हर बिसरी हुई बात फ़िर याद आती है। सब कुछ दिख रहा है साफ़-साफ़, फ़िर आँखें क्यूँ धुँधलके में रहना चहती हैं। खुश रहना कितना सरल सा है; फ़िर क्यूँ ये पलकें बरबस ही बहना चाहती हैं। मन में एक अजब सा सन्तोष है, चित्त में एक सुलगती सी ज्वाला है। जो पीयूष-सुधा बन जीवन दे सकता था; वो बन बैठा विष का प्याला है। खैर अब जो भी है, जैसा भी है, उसे उसी रूप में स्वीकार करना है। राह में फ़ूल आयें या काँटे; सबको समभाव से पार करना है।।

मृत्युपर्व

मृत्यु सत्य है जीवन का, या जीवन मरता नहीं कभी। कहने को आदर्श खोखले, निन्दा करता नहीं कभी।। मेरा जीवन मेरा है, ईश्वर! फ़िर तेरा, कया तेरा; जब नहीं मानता ईश्वर को, फ़िर क्यूँ कहता ईश्वर मेरा। एक देव एक दानव मन में सदा बसाये हम रहते, जब जिसकी मर्जी चलती अपना-अपना दोनों कहते। सत्य कटु है, किन्तु अटल है, दानव मरता नहीं कभी; हाँ, सम्भव है देव कदाचित मर जाये।  दानव हर पल हर क्षण तत्पर रहता है, ये भी सम्भव है देव कभी कुछ कर जाये। मैं नहीं कह रहा दानव शक्तिशाली है, पर क्यूँ हमने देवों से शत्रुता पाली है। अन्धा दानव कितनी भी शक्ति दिखा जाये, पर ये भी तय है कि प्रकाश भी आएगा। माना ताकत है दानव की चतुराई में, पर कब तक वो भी देव से खैर मनाएगा।  सतयुग, त्रेता,द्वापर से कलि तक हम निकले, उतना ही आगे देवों से दानव निकले। पहले देवों में भी मानव सम्मानित था; अब तो मानव, दानव से भी दानव निकले। पर वाह विधाता! तू भी कम चालाक नहीं, तेरे आगे चल सकी किसी की धाक नहीं। जैसे-जैसे हम एक-एक युग बढ़ते गये; तुम मानव की आयु कम, और कम करते गये। है मृत्यु, विजयदशमी देवों की दानव पर,...

प्रेम

शुकदेव और काग प्रभु की चर्चा अत्यन्त महान, खिल जाते है रोम सारे सिंचित होते प्राण । एक प्रात जब प्रश्न जगत हित काग प्रभु ने छेड़ा, शुक के मुख से उत्तर सुनकर उदगत हुआ सवेरा।। प्रश्न काग का उत्तम था, क्यों राधा श्याम कहाए जबकि विवाह श्याम निज मति से रुक्मणि संग कराये। प्रभु शुक ने उत्तर तब दीन्हा, सुनहु काग मुनिराज ! प्रेम अभीष्ट प्रेम अवलंबित प्रेम जीव बड़भाग। प्रेम काम का पुंज नहीं, है प्रेम प्रकृति का रूप; प्रेम प्रकृति के इस वर्णन में राधा दिव्या स्वरुप। प्रेम सदा परिणत हो विधिवत जगत मान्य परिणय में, यह आवश्यक नहीं किंतु इतना निश्चित आशय में। प्रेम सदा उद्दीप्त रहेगा प्रेम सदा उत्कृष्ट, प्रेम भाव का सानी जग में कहीं नहीं अन्यत्र।। प्रेम नहीं वो किंचित जिसमें लेश मात्र भी छल है, प्रेम समर्पण प्रेम भावना प्रेम अतीव सरल है। यों तो जीव सकल हैं जीते इस जग के आश्रय में ; लेकिन जीवन सफल वही जो बीते प्रेम प्रणय में ॥ -- आदित्य कुमार तिवारी < नवम्बर २००६ > ( ये कविता मैंने उस समय लिखी थी, जब मै अपने अभियांत्रिकी तृतीय वर्ष में था और उद्योगनगरी एक्सप्रेस से मुं...

परम्परा

जीभ का काम सिर्फ़ बोलना नहीं होता, हाथ का काम सिर्फ़ सामान उठाना नहीं होता, पैर का काम सिर्फ़ चलना नहीं होता, शरीर का काम सिर्फ़ बोझ उठाना नहीं होता। जीभ हरिश्चंद्र की, जिसने जीवन भर सिर्फ़ सत्य का साथ दिया। हाथ एकलव्य का, जिसने गुरु दक्षिणा में अंगूठा दान दे दिया। पैर महात्मा गांधी के, जिन्होंने अंग्रेजो को भारत से निकालकर ही दम लिया। शरीर दधीचि का, जिन्होंने देवहित अपनी अस्थियों को दान कर दिया। भीड़ के साथ तो सभी चलते रहते हैं; पर जो कल का साथ दे, परम्परा उसे कहते हैं। ( ये कविता मैंने कोई ६-७ वर्ष पहले लिखी थी, आज एक दैनन्दिनी में मिल गयी। )

काहे रे मन धीर ना धरे

काहे रे मन धीर ना धरे, जो बस आवे सो ही करे। मन-ही-मन ये सहज मुसकावे, मन-ही-मन किस-किस पे मरे।। मन बस होय राम, सिय भायी, कान्हा ने रुक्मिणी भगायी। मेरो मन भी यही विचरै, जदपि बिबस कि करे तो क्या करे।। बालकाल सखियाँ अति भायीं, तरुणाई सब जग सुखदायी। पर म्हारी छबि पे कोऊ ना मरै, अब हमहूँ कितने जतन करैं।। मोरी प्रेम ब्यथा सुनौ, राधा नागरि सोइ। हमरे किये तो कछू ना हुइहै, अब तुम्हरे किये ही होइ।।

जीवन-संग्राम

रात अब जाने को है, फ़िर सुबह आने को है। ढल गया था कल जो सूरज, आग बरसाने को है।। जो अभी था डूबता सा, आ गया अब नाव पर। तप्त रेती की लपट से, घने वन की छाँव पर।। कब कहीं रोके रुकी है, अग्नि, जल की धार से। बच सका कब कोई जीवन, सर्प-विष-फ़ुँकार से।। जूझकर लड़ना समय से, ज़िन्दगी का काम है। मौत को भी दे चुनौती, ज़िन्दगी संग्राम है।।

मेरी प्रियतमा

आज एक ख्वाब देखा है मैंने, ख्वाब अपनी आँखों में सपने बोने का, और फ़िर लम्हा-दर-लम्हा उन सपनों को सींचते हुए, एक नयी सुबह का इन्तजार करना। बड़ा अजीब है यह सब, कुछ रोज़ पहले उससे मैं पहली बार मिला था, यहीं किसी छाँव के नीचे, फ़िर कुछ मुलाकातों में ना जाने क्या हो गया। आज कुछ नही सुहाता बगैर उसके, हर पल जाने क्यूँ उसकी ही याद सताती है, कुछ दिन पहले तक जिसे मैं जानता भी नहीं था, आज वही मेरी हर पल की साथी है। पर यह तो केवल अर्ध-सत्य है, पूर्ण-सत्य तो तब होता जब वो भी कुछ कहती, नहीं जानता हूँ क्या है उसके मन में, कुछ है भी या कुछ भी नही। पर शायद हिम्मत भी नही है यह पूछ पाने की, किस हक से मैं उससे ये पूछूँ। कोई तो अधिकार नही मेरा उस पर, पर मेरा तो खुद पर भी अधिकार नही रहा अब। मेरी आँखों में बस उसका सपना है, मेरे होठों पर उसकी हँसी। मेरा हर पल अब बस उसका ही है, वही है मेरी प्रियतमा उर्वशी।।