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ये खोज अंतर्मुखी है...

जिस दिन तक दूसरों के पीछे भागोगे, उस दिन तक कभी अपना स्वत्व नहीं पाओगे। जब थककर अंदर झांकोगे, आप ही अपनी मंज़िल पा जाओगे। ये खोज अंतर्मुखी है... अंतर्तम के गहन सूक्ष्म में सत्य प्रकट है, ढूंढ उसे जो लिया, कहाँ फिर कुछ संकट है। पर तुम से उस तक की यात्रा ही जीवन है,  ढूंढ रहे चहुँओर जिसे, वो अंतर्मन है। सदा छलावे व्याप्त रहे इस जग में ऐसे, दिनकर को घेरे हों राहु केतु शत जैसे। अंधकार का बादल पर जब छंट जाता है, उसे छिपाना फिर कब संभव हो पाता है। तुम दिनकर हो, तुम ईश्वर हो, तुम्ही विधाता, तुम्ही प्रकृति हो, तुम रचना और तुम्ही रचयिता, तुम्ही प्रकट हो, तुम्ही छिपे हो अपने अंदर, तुम्ही बुरे हो, तुम्ही हो अच्छे मस्त कलंदर। तुम ने ही था किया समर वो कुरुक्षेत्र का,  तुम ने ही तुम को गीता का ज्ञान दिया था। तुम्ही थे बैठे बोध गया में ज्ञान की खातिर,  तुमने ही जग हेतु हलाहल पान किया था। तुम से तुम तक और तुम्हारे बाहर भीतर,  तुम्ही व्याप्त हो, तुम्ही छिपे हो तुम से बचकर। तुमने ही ये भेद बनाये थे माया के, तुम्ही गए हो भूल उन्हें इस तरह प्रकट कर। भरा प...

आख़िर किसे फ़र्क पड़ता है..

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वो हर एक शख्स जो मुझे आजमाता है, क्या वो मुझे जानता भी है? जिस कदर खेलता है मुझसे, क्या पहचानता भी है? अपनी मर्ज़ी से मुझे छूता है, छेड़ता है, कचोटता है; प्यार भी दिखाता है और नफ़रत भी करता है | जब मन आता है, अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है, और नुकसान के डर से छोड़ भी देता है | चाहे नर हो या मादा, सबका है दोष आधा-आधा; आख़िर मैं हूँ क्या ? क्यों मुझे हरदम नीलाम करते हो? जब खुद पर बन आती है, आख़िर तभी क्यूँ डरते हो? कहते सब मुझे अपना हैं, मानता कोई भी नहीं | मैं सबका अपना निजी स्वार्थ हूँ | मैं वो सच हूँ, जिसका अपना एक बाजार है | मैं वो सच हूँ, जिसका चल रहा व्यापार है | मैं वो सच हूँ, जो आज भ्रष्टाचार है | मैं वो सच हूँ, जो सचमुच बहुत बीमार है | मैं वो सच हूँ, जिसे बोलने वाला मरता है | मैं वो सच हूँ, जिसे बोलने से पहले एक इंसान सौ बार सबर करता है | मैं वो सच हूँ, जिसको बोलने का साहस लोगों में कहीं खो गया है | मैं वो सच हूँ, जो अब बर्दाश्त के बाहर हो गया है | पर अब जो हूँ, जैसा हूँ, हूँ तो आख़िर सच, तो बोलूँगा भी वही...

अब वक्त ने बदला है पासा

अब वक्त ने बदला है पासा, बनना है लोहे से काँसा। काँसे से बनना है सोना, सोने से फिर कुन्दन होना। अब समय नहीं घबराने का, यूँ ही पत्थर बन जाने का। गलना होगा, जलना होगा; इन राहों पे चलना होगा। ये राहें राह दिखायेंगी, ये वक्त सुनहरा लायेंगी।।