परम्परा

जीभ का काम सिर्फ़ बोलना नहीं होता,
हाथ का काम सिर्फ़ सामान उठाना नहीं होता,
पैर का काम सिर्फ़ चलना नहीं होता,
शरीर का काम सिर्फ़ बोझ उठाना नहीं होता।

जीभ हरिश्चंद्र की,
जिसने जीवन भर सिर्फ़ सत्य का साथ दिया।
हाथ एकलव्य का,
जिसने गुरु दक्षिणा में अंगूठा दान दे दिया।
पैर महात्मा गांधी के,
जिन्होंने अंग्रेजो को भारत से निकालकर ही दम लिया।
शरीर दधीचि का,
जिन्होंने देवहित अपनी अस्थियों को दान कर दिया।

भीड़ के साथ तो सभी चलते रहते हैं;
पर जो कल का साथ दे, परम्परा उसे कहते हैं।


( ये कविता मैंने कोई ६-७ वर्ष पहले लिखी थी, आज एक दैनन्दिनी में मिल गयी। )

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